Wednesday, September 19, 2012

पांडेयजी की रेल यात्रा

दोस्तों नमस्कार, बड़े दिनों बाद आपसे रु-ब-रु होने का मौका मिला. जी जी हाँ, आपकी नाराजगी जायज है लेकिन क्या करू, ज़रा अपनी किताबो में व्यस्त हो गयी थी.

हाँ तो दोस्तों पिछले पोस्ट में आपने पढ़ा की किस तरह टपोरियो की तरह टीपोरी भी हमारे समाज में सक्रिय है. बस इसी परंपरा को आगे बढाते हुए, मैं आप लोगो के सामने एक सांझा की ही रचना रख रही हु. हालांकि इसके लिए मुझे टीपोरी कहना बिलकुल भी जायज नहीं है क्यूंकि यहाँ मैं बता देना चाहूंगी की यह रचना मेरे मित्र गुलशन पाण्डेय की है. अब श्रीमान पांडेयजी ने वास्तव में इसे लिखा या उन्होंने भी इसे कही से टीप लिया इसकी जानकारी मुझे नहीं है. आजकल पांडेयजी के ठौर ठिकाने की भी कोई खबर नहीं है क्यूंकि पिछले साल कुछ दोस्तों से पता चला की श्रीमान हमारे बैंक को अलविदा कह चुके. अब उन्होंने सचमुच अलविदा कह दिया या यह बात बस ऐन्वई उन्हें चिढाने के लिए उड़ाई गयी ये मुझे नहीं मालुम. हालांकि जिस ट्रेनिंग कार्यक्रम में हमारी और बैच के सभी कर्मियों की दोस्ती हुई थी उसको अनुमानतः करीब ३ साल बीत चुके. इसी बीच कई साथी बैंक छोड़ गए. कईयों से कान्टेक्ट ख़तम हो गया. लेकिन यह मानने में कोई गुरेज नहीं पांडेयजी हमारे बैच के सदाबहार कलाकार थे. मसलन यदि गीत गाना हो तो पांडेयजी है न. नृत्य करना हो तो पांडेयजी है न. और तो और हमें ये भी पता लगा की खाना बनाना हो तो भी पांडेयजी है न. एक बार ऐसे ही पांडेयजी को महसूस हुआ की उनका मज़ाक उड़ाया जा रहा है. फिर क्या था. जो उन्होंने चुप्पी साधी की हमारे नेताजी को उनका मुह खुलवाने में पसीने छुट गए.

३ साल हो गए सब  दोस्तों से मिले  हुए. फ़ोन  पर बाते होती  तो है पर यदा कदा. पांडेयजी  अब कहा है, मालुम नहीं. शायद मुग़ल-ए-आज़म गौरव को मालुम हो.

खैर दोस्तों, पेश है पांडेयजी की रेल यात्रा उन्ही की जुबानी...

भारतीय रेल की जेनेरल बोगी,
पता नहीं आपने भोगी या नहीं भोगी,
मैंने भोगी
करनी पड़ी मुझको आकस्मिक यात्रा
स्टेशन पर देख पैसेंजेर  की मात्रा,
मेरे होश उड़ने लगे
मेरे होश उड़ने लगे
हम ब्रीफकेस उठाकर घर की ओर मुड़ने लगे
इतने में एक कुली आया
मुस्कुराया
बोला- अन्दर जाओगे?
मैंने पूछा- तुम पहुचाओगे?
वोह बोले- पंहुचा तो मैं दूंगा
पर रुपये पुरे पचास लूँगा
मैंने कहा- पचास रुपईया?
वह बोला - हाँ भईया,
पहले तुमको उठाना होगा
फिर अन्दर धकियाना होगा
मैंने कहा- चल भईया,
तू ले ले पचास रुपईया,
उसने मुझे उठाया,
पहली बार उठाया तो बैठ गया
दूसरी बार उठाया तो लेट गया
फिर बोला-भैया,
तुम रखो अपना पचास रुपैया,
तुमको मैं क्या उठाऊंगा
तुमको उठाते उठाते मैं खुद ही उठ जाऊँगा...
मैंने उसका हौसला बढ़ाया
उसने भी जय  बजरंग बली का नारा लगाया
और किसी तरह आपातकालीन खिड़की के रास्ते मुझे अन्दर पहुचाया
अन्दर डिब्बा घमासान था
अपने आप में पूरा हिन्दुस्तान था
कुछ बैठे थे, कुछ खड़े थे,
जिनको  कही जगह न मिली वो बर्थ के निचे पड़े थे
मैंने भी टांका भिड़ाया
एक सोते हुए आदमी को खिसकाया
और थोड़ी सी जगह में खुद को बिठाया
तभी अचानक उसी खिड़की के रास्ते एक बोरा अन्दर आ गिरा
एक सज्जन चिल्लाये- अरे, किसका बोरा है ये किसका बोरा?
तभी बोरे में एक लड़का निकलकर बोला,
अकेला नहीं है ये बोरा ,
बोरे के अन्दर है एक छोरा ,
अन्दर आने का यही एक तरीका था,
जो मैंने अपने माँ-बाप से सीखा था
अभी वो भी इसी खिड़की के रास्ते इसी तरह अन्दर आयेंगे
मैं तो बर्थ के निचे घुस जाऊँगा,
वो आपके सर पर बैठ कर जायेंगे.
कहिये, आप और कुछ भी फरमाएंगे?
वो सज्जन बेचारे चुप हो लिए.
अब क्या हुआ आगे, सुनिए ,
एक गंजे भाई साहब के सर पर गिरी  पानी की दो चार  बूंदे,
वो चिल्लाये और गरजे,
अरे कौन है कौन है?
जल गिरा कर मौन है?
तभी ऊपर वाले बर्थ से एक महिला बोली,
भाई साहब हमारे यहाँ चार महीने का मुन्ना लेटा है,
ज़रा चुप रहिये की अगर ये जाग गया तो...
और बस फिर वो चुप हो ली..
तभी अचानक गाड़ी हिली ,
किसी ने कहा चली,
किसी ने कहा खुली,
किसी ने कहा या अली,
कोई बोला जय बजरंग बली,
मैंने खिड़की बाहर झाँका,
बाहर का नज़ारा ताका,
और अन्दर आकर सबको बताया,
अरे भैया, कहे की अली और काहे की बली
गाडी तो बगल वाली चली,
गाडी बगल की चलती जा रही है
और तुमको अपनी चलती हुई नज़र आ रही है

यही दुनिया है दोस्त,
धन्यवाद.




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